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an effort of popular Khortha monthaly magazine "LUATHI"

खोरठा की लोकप्रिय मासिक पत्रिका "लुआठी" का विनम्र प्रयास

 

खोरठा साहित पुरोधा श्रीनिवास पानुरी

खोरठा भासाँइ गीत झुमइर सें उपर उइठ ’शिष्ट साहित्य’ के बेबस्थित रचना कइर खोरठा भासा साहितेक डँड़वे वाला जते जइ लोक भेला, श्रीनिवास पानुरी जीक नाम सबले उपर लेल जाहे। जोदि पानुरी जीक खोरठा ’शिष्ट’ साहितेक जनक कहल जाय तो बेजाँइ नाय।

श्रीनिवास पानुरी जीक जनम 25 दिसंबर 1920 ई0 के बरवाअड्डा (धनबाद) में भेल हलइ। इनखर बापेक नाम शालीगाम पानुरी आर मायेक नाम हलइ दूखनी देबी। पानुरी जीक पढ़ा सुना जिला इसकुल धनबाइदें मेटरिक तक भेलइ। पानुरी जी गरीबीक चलते बेसी पढ़ लिखे नाय पारला आर आपन खानदानी पेसाँइ लाइग गेला। धनबाइदेक पूरना बजारें गिरहस्तीक गाड़ी चलवे ले पान गुमटी खोलला। इनखर पान गुमटीं बइस ई छेतरेक नाम जइजका साहितकार सब साहितिक चरचा करऽ हला। जकर परभाउ इनखर भीतरेक साहितकारेक उपर पड़लइ आर इनखर भीतर के ’कवि’बाहराइ लागलइ।

सुरू में ई हिन्दी में फेर खोरठें लिखेक सुरू करला। वइसें तो इनखर लेखन आजादीक आगुवे ले सुरू भइ गेल हलइ जइसन कि पता चले हे, आर तखनेक ’आदिवासी’पतरिका जे राँची से बाहराहल ओकर मे इनखर रचना छप हल। धनबादेक ’आवाज’ आर ’युगान्तर’ में प्राय इनखर रचना छपऽ हल मेंतुक इनखर पहिल एकल खोरठा संकलन छपल ’बालकिरण’ आर कुछ महिनाक बाद ’दिव्य ज्योति’ 1954 सालें। ’बाल किरन’ खोरठाक पहिल छपल किताब मानल जाहे। केउ केउ उनखर पहिल रचना ’तितकी’ के मानथ मेंतुक एकर कोन्हों प्रमाण नाय पावा हे।

पानुरी जी खोरठा पत्रकारिताक जनको मानल जा हथ ई सबले आगु जनवरी 1957 साले ’मातृभाषा’ नामेक मासिक पत्रिका संपादित करला जेकर में एक संगे हिन्दी आर खोरठा रचना छपऽ हलइ।एकर बाद फेर 1970 सालें दोसर पत्रिका संपादन करला ले असलें पहिल खोरठा अखबार हलइ ’खोरठा’ (पखवारी)।

इनखर बेसी ख्याति ’मेघदूत’ सें भेलइ जे 1968 सालें छपल आर एकर चरचा तखनेक साहितकार सब खुब करला। तकर दू बछर बाघीं ’रामकथमृत’ छपलइ जकर खोरठा रामायण रूपें परचार करल गेलइ।

ई मूलतःकवि हला मेंतुक नाटक लेखन आर मंचन बाट ओतने हूब हलइ। से समय धनबाद छेतरे घुइर घुइर नाटक मंचन करऽ हला आर कवि मंच तो हइये हलइ। खास कइर ’उदभासल कर्न’ आर ’चाभी काठी’ नाटक बेसी मंचित करल जा हे ई चाभी काठी बुझा हे बिनोद बिहारी महतो जीक चरित टा राइख देल हला जे उनखर सहयोगी आर प्रसंसक हला।

पानुरी जी से समयेक नामजइजका हिन्दी साहितकारेक संपर्के हला जे उनखर साहितिक प्रतिभाक कायल हला। जइसें राहूल सांस्कृत्यायन, पं0 रामदयाल पांडे, बेधड़क बनारसी, आचार्य शिवपूजन सहाय, हंस कुमार तिवारी, जानकी वल्लभ शास्त्री, राधाकृष्ण, डा0 बीरभारत तलवार, मनमोहन पाठक आर विकल शास्त्री जीक नाम मुइख रूपें लियल जाइ सके हे।

उनखर निकट सहयोगी हला नारायण महतो (अधिवक्ता), विश्वनाथ प्र0 नागर, नरेश नीलकमल, विश्वनाथ दसौंधी ’राज’, फुलचंद मंडल आर उनखर उपर बरद हस्त हलइ कतरासेक राज पूर्णेदू नारायण सिंह आर बिनोद बिहारी महतो जीक।

उ खोरठा आर हिन्दी में लगभग चालीस किताब लिखला जइसन चरचा हे जकर में जकर पूर पूरा छपेक जानकारी पावा हे उ हे- बाल किरण, दिव्यज्योति, मेघदूत, रामकथमृत, मालाक फूल (संपादित), समाधान (हिन्दी) आर हाल फिलहाल छपल ’चाभी काठी’। उनखर कइयेक पांडुलिपि खोरठा पाइठक्रमे राखल गेल हे आर छपेक आसाँइ हे।

1957 में आकाशवाणी राँची सुरू भेल बाद इनखर खोरठा कविता आर बारता परसारित हवे लागलइ। राँची विश्वविद्यालय में ’जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा’ बिभाग खुलल बाद ई बाँचल तक संपादक मंडल के सदइस रहला।

7 अक्टुबर, 1986 के अचक्के हिरदय कति रूकल सें सिराय गेला। मेंतुक आइज खोरठा सहितेक बोड़ गाछ एते झबरल पसरल देखा हे सेटा पानुरी जी के रोपल हलइ।

पानुरी जीक खोरठा साहितें एक छितर राइजेक चलतें 1950 से 186 ई0 तक के चलीस साल खोरठा साहितेे ’पानुरी जुग’ के नाम से जानल जाहे।

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अंकः 1, वर्षः 2, सितम्बर 2010

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Issue: 1, Volume: 2, September 2010

 

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खोरठा झारखंडेक गोटे उत्तरी छोटा नागपूर, संथाल परगना छाड़ा राँची, पलामुक हिस्सा में पसरल हे आर ई हिंयाक मूलवासी-आदीवासीक संपर्क भासा हे। एकर पढ़ाई एखन नवम कलास सें एम0 ए0 तक भइ रहल हे। एकर सें पी0 एच-डी0 डी0लीट्0 भइ रहल हे। एकर लइ जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।

 

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

 

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