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an effort of popular Khortha monthaly magazine "LUATHI"

खोरठा की लोकप्रिय मासिक पत्रिका "लुआठी" का विनम्र प्रयास

 

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 1

खोरठा साहित के लोक साहित आर शिष्ट साहित दू खांधाँइ बाँइट देखेक चाहि।

पहिल- लोक साहित

लोक रचना तो आपन रचवइयाक छोइड़-बिदराइ के लगस्तरे आगु-आगु अगुवइले जाइ वाला जिनिस लागे। लोक रचना तो ई रंग जिनिस लागे जे रचना तो सोउ-सोउ बछर ले लोक बेबहारें अइते जाइ रहल हे, मेनेक तकर रचवइयाक अता-पता नाँइ। से रचनवइया टा जे रह-हलक तो प्राइ-प्राइ अनपढ़ निपट-काने, मेनेक अइसन-अइसन अड़गुड़ जिनिस अनबिसरवा पुरखउती सँपइत रूपें तामान रहले आइल हे। समाजेक मनोरंजन आर मानव-रंजन करेक संगे-संगे दिमागी खोराकेक काम करइते आइल हे। बेस-निफुट दिमागी खोराक। अछल-गदल मन भोरवा दिमागी खाना।

लोक साहितेक दोसर बड़का गुन ई हे जे सइकड़ो बछर ले ई खाली कान आर मुँहेक मदइथीं अगुवइले चलले आइल हे। प्राइ-प्राइ आपन अजगइबी आयाँ रूफीं- बिना हेराइल, बिना बेंड़ाइल! सुनवइयाँइ कहवइयाक मुँह ले सुनल आर सेटा आपन मने-मगजें जोगाइ राखल। बतर सिरें आर तइसन कामेक पेछाँइ फइर सइए लोक रचना टाके- सुन कइहनी, जानकइहनी, लोकगीत, भनता-कबिता, गीत-डोहा, पटतइर-आहना, हियाँली हेन तेन कते कि रूपें अबिकल सइए रकम बेबहार करल, बतर सिरें गाइ-सुनाइ देल। मानुसेक समाजेक पइत दिनेक काम-उदम, परथा-परिपाटी संगे आड़ा ले गोड़ा तक मेल बा नाता-गोता राखेक दाएँ लोक रचना गुला बेंड़ाइ-बँड़ुवाइ नाँइ, हेराइ-सिराइ नाँइ! कागइज-कलमेक मदइत बिना तामने रहे आर बाढ़े।

लोक साहित के संकलन रूपें छपल किताब हे- ’एक टोकी फूल’ (खोरठा लोकगीतेक बिसेस संगरह, संपादक- ए0 के0 झा), खोरठा लोककथा (सुन कइहनी-जानकइहनी, प्रधान संपादक- ए0 के0 झा), ’लुआठी’क अंक- 2,3,4 लोकगीत बिसेसांक हल जकर में ’एक टोकी फुल’ में छुटल बाढ़ल गीत के संकलन हे। ’कइमइति’ (करमा गीत, संपादक- श्याम सुन्दर केवट ’रवि’)।

झारखंड सरकार के कल्याण मंत्रालय के अधिन ’झारखंड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान’ (राँची) बाट ले झारखंडेक लोक साहितेक संकलन आर संपादन के महती काम करल गेलइ जकर में झारखंड के नोउ भासा खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनियाँ, संथाली, हो, मुंडारी, खड़िया आर कुरूख के साहितकार सब के भिनु-भिनु भासा समुह में जुटाइ लोक साहितेक संकलन-संपादन के जिम्मेवारी देल गेलइ जेटा करीब चाइर बछर के बाद 2010 में पूरा भेलइ। खोरठा भासा समुह सें सात लोकेक संपादक मंडल में हला- डॉ0 ए0 के0 झा (प्रधान संपादक), प्रो0 चितरंजन महतो ’चित्रा’ (सहायक संपादक), शिवनाथ प्रमाणिक, श्याम सुन्दर महतो, डॉ0 बी0 एन0 ओहदार, दिनेश ’दिनमणि’ आर गिरिधारी गोस्वामी ’आकाश खूँटी’। खोरठा लोक साहितेक ई 339 पाताक ई संकलने 42 लोककथा, लोकगीत, लोकगाथा-माहराइ, आहना, पटतइर, मंतर आर कइयेक महती लेख सामिल हे। एकर छपाइ ’झारखंड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान’ (राँची) बाट ले हवेक हे। एतनाक बादो इटा नाय बुझेक चाहि जे सब लोकसाहितेक संकलन भइ गेल हइ, असलें संकलित लोक साहित गोटा लोक साहितेक दसवाँ हिस्सा से बेसी नाय हे। एखनु खोरठा लोक साहितेक संकलन आर संपादन के देदार संभावना हे। लोक मानस में सामाइल लोक कवि आर कलाकारेक पाँताँइ राखे पारी सिराइल चामुकामार, भवप्रितानंद ओझा, बिनंदिया (बिनोद सिंह), हाड़ी राम, गांगु राम, चोपला, सूसीला, कवि तितकी राय हेन-तेन।

Current Cover

अंकः 1, वर्षः 2, सितम्बर 2010

Latest issue of LUATHI

Issue: 1, Volume: 2, September 2010

 

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खोरठा झारखंडेक गोटे उत्तरी छोटा नागपूर, संथाल परगना छाड़ा राँची, पलामुक हिस्सा में पसरल हे आर ई हिंयाक मूलवासी-आदीवासीक संपर्क भासा हे। एकर पढ़ाई एखन नवम कलास सें एम0 ए0 तक भइ रहल हे। एकर सें पी0 एच-डी0 डी0लीट्0 भइ रहल हे। एकर लइ जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।

 

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

 

 

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