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an effort of popular Khortha monthaly magazine "LUATHI"

खोरठा की लोकप्रिय मासिक पत्रिका "लुआठी" का विनम्र प्रयास

 

खोरठें फिंगाठी (व्यंग्य) रचना

- ’आकाश खूँटी’

खोरठाक व्यंग्य परंपरा ढेर पुरान हे गइद आर पइद दूगो रूपें। गइद रूपें कुछ आहना (कहावत) देखा जे व्यंग्य के बेस उदाहरन हे,’’ हूड़साक पिंघना ढिढ़ाक उपर, मंगनीक घोर चेंका सवाद, पइरकल बाभना घुइर-घुइर आँगना, गाछे कठर ओंठे तेल, गुर खाय कें गुलगुला सें परहेज ?. ’
पइद हिंसाबें कुछ लोकगीत, जे रंग बिहाक समय दुवाइर लागल समय -
‘‘तोय मायें सेंकल हलो एंड़री पातें
हाम सेंकवो पान पातें रे . . . ।’’
खोरठा शिष्ट साहितो में फिंगाठी रचनाक परंपरा दूयो रकम रहल हे-
गइद रचना- 1957 में ‘मातृभाषा’ पतरिकें श्री निवास पानुरी जी आम चुनाव के ‘भोट परब’ कइह आपन संपादकीय में व्यंग्य करल हथ (मातृभाषा मासिक अंक - 2, मार्च 1957)
1970 सालें श्री निवास पानुरी जीक संपादने खोरठा पखवारीं प्रो॰ नरेष नीलकमल जी के एगो व्यंग्य कॉलम छप-हलइ ‘सदाय कच-कच’ जेटा से समय ढेर पसिंद करल गेल हलइ।
खोरठा पतरीका ‘तितकी’ मासीक (1977-78) में तनी हाँसबो करा, शिर्षक सें कुछ हास्य व्यंग्य के छोट-छोट उदाहरण पावा हे।
महेश गोलवार जीक ‘उड़ीस महतम’ एगो बेस व्यंग्य के नमुना हे जेटा बादें ‘गइद-पइद संग्रह’ में छपइल देखा कुछ अंस।
‘‘ . . . गिरहस्थ के राइत-राइत भइर जगाइ राखे हे ई ओजह से चोरी, सेंधमारीको कोन्हों डर नाय रहे हे। पढुवा छउवा सब के खातिर तो बड़ा उपगारी जीव हको जखन छउवा पढ़ते-पढ़ते झुँपे लागऽहथ, तखनो कलें-कलें, खट।
आर छउवा सुतता! सुगा तरि पाठ रटेक सुरू कइर दे हथ। मांय-बाप बा गुरूजी छउवा सबके ओतना धेयान नाय देवे पारऽहथ जतना उड़ीस।’’
बइसें खोरठा में गइद व्यंग्य के कोन्हो एका किताब छपल नखे मेंतुक पत्र-पतरिका आर अइन संकलने बेस-बेस व्यंग्य के उदाहरण हे जे रंग बी. एन. ओहदार जी के ‘खोरठा निबंध’ किताबें कइयेक निबंध व्यंग्य के बेस उदाहरण हे। ‘सोबटाय चल हे’ में-
‘‘ . . . तोहिन पूछभे कि सजीव तो चलबे कर हे निर्जीव की रकम चल हे भला! पर जनाब निर्जीव चल हे आर सौ फीसदी चल हे। जखन हड़ताली या प्रदर्षन करवइया गुलीन कोन्हो रकम काबु में नाय आवथ तखन देखभे की रकम लाठी चल हे आर प्रदर्षन करबइया गुलीन बाट ले ईटा आर पखन की रकम चल हे।’’
‘बइजका बगरा काम कम’ के व्यंग्य देखा -
‘‘एक बइर इंदरा गाँधीक मगज बेंड़ाइल रहइन जे चाइरो चगुरदे लिखउले रहथ, ‘‘काम अधिक - बातें कम।’’ ई कोन्हों बात भेलक, सगरो घरी काम आर काम, की हामनि कोन्हों गरू डांगर हकी जे हाड़ रगड़इत रही इ्र तो हामनिक संस्कृति उपरे हमला।’’
ताकर मजा देखा, ईंदरा गाँधी के अइसन पटकनिया देला जे चेते चघलइन . . . ।’’
‘हामे खड़ा हों’ के नमुना देखा -
‘‘ . . . . जोदि तोहें चाइर छव महिना जेहलेक हवा खाइ घुरल हा तब तो सुभान अल्लाह! इ तो गोउरव के बात। गाँधी, सुभाष, जवाहर, भगत सिंह सभिन जेहलेक चक्की पिसल हथ। तोहें जेहलेक हवा खाइ घुरल हा तो लजाइ सरमाइक की बात। बुइझ ला ओहे गाँधी-नेहरूक लेताइरेक (परम्परा) लोक हा तोहरा। जोदि तोहर ठीन एतना गुन हो तब तो खड़ा हवे में बोनस नम्बर मिलतो . . . .।’’
1989 में बोकारोक ‘उड़ान’ पत्रिका में गिरिधारी गोस्वामी जीक व्यंग्य चरचित भेल हलइ, ‘‘आब नेता अइता हामनिक दूवाइर’। लुआठीक अंक - 6 (जुन 2001) में ए. के. झा जीक फिंगाठी छपलइ, ‘महापरभुक किरपांइ झारखंड’ चमकता आइना (धनबाद) में खोरठा कॉलम षिर्शक से अर्जुन पानुरी जीक कुछ व्यंग्य छपइल।
पइद रचना- खोरठा हास्य व्यंग्य रूपें एखन तक एगो स्वतंत्र किताब छपल हे, जनार्दन गोस्वामी ‘व्यथित’ जीक ‘चाँदिक जुता’ (2003) एकर में नाना रकमेक छंदें ‘व्यथित’ जी हास्य आर व्यंग्य के बेस नमुना पेस करल हथ, खास कइर इनखर ‘कुण्डलियाँ’ षैली के फिंगाठी गुला बेस बइन पड़ल हे,
देखा -
तास
1.) दोसर काम छोड़के खेलें बेटा तास
तासेक भीतर बेटा हये लक्ष्मीक बास
हये लक्ष्मीक वास, जुआइ अरपन कइर दे
कह ‘व्यथित’ कविराइ, जुआंइ सुजोधन जीतल,
पांडव के बनबास, अंघाक छाती सीतल।
2.) रोज कर रंगदारी बेटा, हर दम करे उतपात
आइज दुनिया बदइल गेलो एकरे में हो भात
एकरे में हो आमदनी लोक करतो सलाम
तोर नाइ अइतो केव पास समाजे उठतो नाम
एक दिन बनबें नेता देसें इ हो पहिला सीढ़ी
नेता से मंत्री मुख्यमंत्री तब कमाइ गाढ़ी
खादीक कुरता
सियाव खादीक कुरता कर नेता के साथ
जोड़ नेता से नाता, धोव गंगाइ हाथ
धोव गंगाइ हाथ लोक के झाँसा दीहीं
बाँध झुठेक पूल चंदाक कर नित उगाही
कह ‘व्यथित’ कविराय कुछ दिने बनबे नेता
कइर के साँठ-गाँठ तब मार चाँदिक जुता।
श्याम सुंदर महतो जी खोरठाक ओइसन गनल चुनल कविक मइधे हथुन जकर कविता लोक मन लगाय सुने। उनखर ‘तोय आर हाम’ रचना बड़ी लोकप्रिय भेल हे आर उ एगो बेस व्यंग्य हे, देखा एक झलक
बेटिक बनवा पूरा लेकी
ढाँइ-ढाँइ कूटतो ढेंकी
घारे राखा बनाय बोकी
तबे करतो चुल्हा चोकी
बेटिक काम चुल्हा फूंका
पढ़े खोजलें मारा मुका
दोसर देखा -
जमीन बेच बहरिया हाथें फइदा पइभे जादा
बेंचे खातीर जोगवल जमीन हमनिक बाप दादा
कते करभे हार-फार कोड़ी कोदाइर कादा
हाथे नगद टाका रहले खाइक पियेक गादा
बिना खटल सुखे खइभे रोज पेट उर्रांइ
जमीन बेंचा, जमीन बेंचा, जमीन बेंचा भाइ
सड़क धारिक जमी गुला, राखा बड़ी दाइ।
हास्य व्यंग्य के कवि रूपें रामशरण विश्वकर्मा जी के पहिले गनल जाहे हालांकी उनखर एखन तक कोन्हों आपन संकलन बाहराइल नांय हइ मेंतुक कूछ संकलन आर पतिरके उनखर कुछ रचना आइल हे। एक झलक देखा -
‘‘जते हल बड़ गुंडा एम. एल . ए. सांसद बइन गेला।
जते हल छोट - छोट गुंडा मुखिया सरपंच बइन गेला।’’
(खोरठा गइद-पइद संग्रह सें)
लुआठी अंक - 5 में उनखर ‘महिला आरक्षण बील’ उपर व्यंग्य हलइ-
‘‘तोर मुँह बड़ी बहकल
रहे हे बड़ी सनकल।
धइन हा भगवान, जदि महिला आरक्षण
विधेयक पास होंइ जइतल
तोर टेंगरी आकासें रहतल . . .।’’
डा॰ गजाधर महतो ‘प्रभाकर जीक व्यंग्य कविता देखा
‘‘खादी पूछल खाखी से, हामीन दूइयो में मेल काहे
खाखी कहल हामीन दूइयो कर नाम ‘खा’ ले
सुरू हव हे से ले हामीन आम अदमी के
खाय जान ही . . .। (रूसल पुटुस से)

‘‘तोहिन भोट देवाय तो हाम हेठ से उपर चढ़ब
गाँव छाड़ी राजधानी जाव, हमरा मीलत हुँआ
खाली आसन, आर तोहिन के मिलतो
खाली आष्वासन’’ (एक पथिया डोंगल महुआ से)
सुकुमार जीक देखा व्यंग्य, इनखरो आपन स्वतंत्र व्यंग्य काव्य नखइ -
‘‘चुइलह राखय झुपुर - झुपुर
माखइ नाय कभुं तेल
पींध के बेलबटम नुनु
बेंग नीयर फुइल गेल . . .। (एक पथिया डोंगल महुआ से)
संतोष कुमार महतो जी के एक मउनी फुल में कूछ फिंगाठी हे देखा-
फेर चासाक छोवा भेला बाबुआन ई छोवांय की अरजी देतो धान।’’
गधा के बाप कहे हतो, चमचा, हामे तोहर सें नाय किछू मांगबो कवितइन में बेस व्यंग्य हे
ई रकम छीट-पुट व्यंग्य उपर ढेर लोक लिखल हथ - सुरूवे में श्री निवास पानुरी जी आपन ‘दिव्यज्योति’ (1954) में व्यंग्य कविता लिखल हथ
‘‘भोजीक हमर चसक भारी
धोवे खोजे साबुने तरकारी’’ (दिव्यज्योति)
प्रो॰ नीलकमल जीक देखा -
‘‘जोदि मोरे सास हमर,
बावे दहिने पाठा
माइ काली गो
बाँवे दहिने पाँठा
(पुतोक मानान कविता से तितकी अंक 8 सितंबर 1977)
ई तरी हम देखऽ ही कि खोरठा व्यंग्य साहित बेस भरल पुरल हे।

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अंकः 1, वर्षः 2, सितम्बर 2010

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Issue: 1, Volume: 2, September 2010

 

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खोरठा झारखंडेक गोटे उत्तरी छोटा नागपूर, संथाल परगना छाड़ा राँची, पलामुक हिस्सा में पसरल हे आर ई हिंयाक मूलवासी-आदीवासीक संपर्क भासा हे। एकर पढ़ाई एखन नवम कलास सें एम0 ए0 तक भइ रहल हे। एकर सें पी0 एच-डी0 डी0लीट्0 भइ रहल हे। एकर लइ जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।

 

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

 

 

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