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an effort of popular Khortha monthaly magazine "LUATHI"

खोरठा की लोकप्रिय मासिक पत्रिका "लुआठी" का विनम्र प्रयास

 

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 1

लोक रचना तो आपन रचवइयाक छोइड़-बिदराइ के लगस्तरे आगु-आगु अगुवइले जाइ वाला जिनिस लागे। लोक रचना तो ई रंग जिनिस लागे जे रचना तो सोउ-सोउ बछर ले लोक बेबहारें अइते जाइ रहल हे, मेनेक तकर रचवइयाक अता-पता नाँइ।

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 2

साहित-हजारो बछरेक लोक साहितेक रचनाक पर 20 वीं सदिक पचासवां दसक सें खोरठा ’शिष्ट’ साहितेक बेवस्थित रचना हवेक सुरू हवे हे। लोककथा, लोक गीत, झुमइर हेन तेन से उपर उइठ भारतेक आजादिक आगुवे से भुवनेश्वर शर्मा ‘ब्याकुल’ जी खोरठें गीत आर कविता लिखला जेकर हिंया हुँआ छपेक जानकारी पावा हे मेंतुक एकर वेवस्थित रूपें साहितिक रूप दिये में श्री निवास पानुरी जीक नाम लियल जा हे।

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 3

गइद साहित - खोरठें गइद लेखन 1957 सालें श्री निवास पानुरी संपादित खोरठा पतरिका ’मातृभाषा’ से कहे पारी हालांकि से समयेक’ आदिवासी’, आवाज, युगांतर रकम हिंदी पतरिकें पानुरी जी आर कुछ अइन लिखवइयाक खोरठा लघुकथा, एकांकी हेनतेन छपेक चरचा हे। फेर 1970 बछरें ’खोरठा’ (पखवारी) आर 1977-78 साले ’तितकी’ ( मासीक) पतरिके खोरठा कहनी, एकांकी, फिंगाठी ( व्यंग्य) आर रिपोर्टिंग छपे हे।

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 4

जातरा बिरतांत- एकल संकलन पंचम महतो जीक ’मनचरयाँ’ छपल हे। मेंतुक कूछ आर बेस रचना छपल हे जेरंग डा0 चतुर्भूज साहु के दारजिलिंग आर गंगटोकेक जातरा (खो0 गइद-पइद संग्रह) बी0एन0 ओहदार जीक छोटानागपूरेक नैनीताल नेतरहाट’ (खोरठा निबंध) आर पंचम महतो जीक लिखल ’गंगासागर (लुआठी- अंक-5) बेस जातरा विरतांत हे। शिवनाथ प्रमाणिक जीक ’संकरी नदिक काछार (तितकी 4/2000) पढ़इतें से जघऽ जाइक हूब जागे हे।

खोरठा साहित: उद्भव आर बिकास - 5

खोरठा पतरिकाँइ प्राइ भिनु-भिनु बिसयें लेख, निबंध छपइत रहे हे। ए0के0 झा जीक खोरठा काठें गइदेक खँड़ी प्राय निबंध आर लेखेक संकलन हे, झा-चतुर्भूज के ’खोरठा सहित सदानी-विभिन्न पहलुओं पर विचार में कइयेक गो बेस लेख हे। ताव एहे कहल जाय पारे कि ई विधांइ जेतना काम हवेक चाही भेल नखइ।

खोरठा साहितेक काल बिभाजन

खोरठा शिष्ट साहितेक विकासेक हिसाबें एकर काल विभाजन खोरठा साहितकार सब करेक चेस्टा करल हथ। कृष्ण चंद्र दास ’आला’ जी आपन किताब ’भाखा गर्हन’ में खोरठा काल विभाजन करल हथ गोड़ा पहर (आदि काल) 1857-1947, बिचेक पहर (मध्य काल ) 1947-1984, आब्गा पहर (आधुनिक काल) 1984 के बाद।

खोरठा साहितें प्रबंध काइब

खोरठा साहितें अइन विधाक तुलनाइ काइब रचना सबले बेसी भेल हे। लगभग पचास पइद किताब में सब रकमेक गीत-फुटकर कविता, संपादित, खंड काइब, प्रबंध काइब से महा काइब सामिल हे।
कोन्हों भासाक सहितेक असल पहचान उ भासाक महती काइब रचना सें आंकल जा हे। गोटइना काइब रचना में कोन्हों कविक गोटइना काइब खेमोता देखवेक मोका मिले हे, से ले ई लेखें खोरठा साहितें रचल गोटइना काइब के परिचय दियेक चेस्टा करल गेल हे।

खोरठें फिंगाठी (व्यंग्य) रचना

खोरठाक व्यंग्य परंपरा ढेर पुरान हे गइद आर पइद दूगो रूपें। गइद रूपें कुछ आहना (कहावत) देखा जे व्यंग्य के बेस उदाहरन हे,’’ हूड़साक पिंघना ढिढ़ाक उपर, मंगनीक घोर चेंका सवाद, पइरकल बाभना घुइर-घुइर आँगना, गाछे कठर ओंठे तेल, गुर खाय कें गुलगुला सें परहेज ?. ’

उपलब्ध खोरठा किताबें

यहां हम कुछ उपलब्ध खोरठा किताबों की सूची प्रकाशित कर रहे हैं। जिन्हें खोरठा भाषाप्रेमी, साहित्यकार, शोधार्थी एवं विद्यार्थीगण प्राप्त कर सकते हैं।

Current Cover

अंकः 1, वर्षः 2, सितम्बर 2010

Latest issue of LUATHI

Issue: 1, Volume: 2, September 2010

 

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खोरठा झारखंडेक गोटे उत्तरी छोटा नागपूर, संथाल परगना छाड़ा राँची, पलामुक हिस्सा में पसरल हे आर ई हिंयाक मूलवासी-आदीवासीक संपर्क भासा हे। एकर पढ़ाई एखन नवम कलास सें एम0 ए0 तक भइ रहल हे। एकर सें पी0 एच-डी0 डी0लीट्0 भइ रहल हे। एकर लइ जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।

 

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

 

 

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