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an effort of popular Khortha monthaly magazine "LUATHI"

खोरठा की लोकप्रिय मासिक पत्रिका "लुआठी" का विनम्र प्रयास

 

खोरठा भाषा-परिचय

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

जहाँ तक खोरठा भाषी जन समूह का प्रश्न है, तो खोरठा भाषा झारखंड के दो प्रमंडलों (उत्तरी छोटानागपूर और संथाल परगना) के अधिकांश की मातृभाषा होने के साथ-साथ झारखंड के चौबीस जिलों मे से पंद्रह जिलों की पूणतः या अंशतः संपर्क भाषा है। अन्यतः इस खोरठा भाषी जनसंख्या को समझने के लिए हम जे0पी0एस0सी0 (झारखंड लोक सेवा आयोग) के परीक्षार्थियों की संख्या से ज्ञात कर सकते हैं कि झारखंड के सबसे बड़े क्षेत्र की भाषा खोरठा भाषा है। तभी तो जे0पी0एस0सी0 में नौ झारखंडी भाषाओं के कुल परीक्षार्थियों में से सिर्फ खोरठा परिक्षार्थी ही लगभग पैंतालीस प्रतिशत थे और बाकी आठों भाषाओं के परीक्षार्थी कुल पचपन प्रतिशत थे।

ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि

खोरठा के भाषागत अध्ययन-अनुशीलन से लगता है कि इसकी जड़ें मनुष्य के प्रचीनतम विकास काल तक जाती है। इस परिप्रेक्ष्य मे कुछ प्रयोगों पर गौर करें-

(क) ’रंगिया गरूआ अइलइ....’ - यहाँ ’रंगिया’ शब्द किसी भी रंग का सूचक नहीं है, बल्कि सिर्फ और सिर्फ लाल रंग का निर्देशक है। यानी जिस काल में सिर्फ एक ही प्रारंभिक रंग की पहचान मनुष्य को हो पाई थी तभी का यह शब्द प्रयोग है।

(ख) ’गरू सहर-हइ...., गीदर सहर-हइ.....’ यानी मल त्याग के अर्थ मानव और पशु के लिए प्रयोग साम्य भी अति प्रचीनत्व को ही दर्शाता है।

(ग) ’मानुस होवा’ - ’ऊ गीदर टा (छउवा टा) मानुस भेलइ।’- और यह प्रयोग प्राचीनत्व के बोध के साथ-साथ यथार्थत बोध भी करवाता है। यानी किसी के मानसिक विकास के बाद ही उसे मनुष्य की श्रेणी में गिनने की सही और यथार्थवादी परंपरा।

(घ) हिंसा, हुँड़ा, विजइ करा...’- जब पशु मांस के व्यापार के लिए खस्सी वगैरह का बध कर उसका मांस निकाला जाता है, तो कहा जाता है-’ हिँसा लागल हइ, एक हुँड़ा लइ आन। बिना वजन किये समान रूप से किये गये भाग को ’हूँ़ड़ा’ कहा जाता है। उसी प्रकार भोजन के लिए बुलाने में कहा जाता है-’ खाइक तइयार हइ, चला बिजइ करा’। यानी शिकारी मानव की प्राचीनता का परिच और उसके साथ ही शिकार के सामूहिक भोज या पशु शिकार की विजय में हिस्सेदारी का द्योतक।

खोरठा नाम करण

विवेचन से ज्ञात है कि खोरठा शब्द खरोष्ठी का अपभ्रंश है, रूपांतरण क्रम - खोरोष्ठी- खोरोठी - खोराठा - खोरठा या फिर खरोष्ठी - खोरोठी - खोराठा - खोरठा।
संबद्ध बात को अन्यतः समझें, अपभ्रंश क्रम
बंदोपाध्याय------बनजी, बाँड़ुज्ये
मुखेपाध्याय------मुखर्जी, मुखुटि, मुखुज्जे आदि-आदि।
उसी प्रकार खरोष्ठी -खलोष्ठी- खलोठी ।


सिंधु सभ्याता से संबद्धता
शब्द प्रयोग, लिपि-प्रयोग एवं आज तक अतिवाहित सामाजिक प्रयासों से तो खोरठा भाषा का ऐतिहासिक संबंध लक्षित होता ही है। उसके अतिरिक्त मूल प्रयोग भी इसके द्योतक हैं।

यथा- हड़प्पा और मोहन जोदड़ो शब्दों के अर्थ बतलाए गए हैं, क्रमशः आकस्मिक प्राकृतिक विपत्ति और हड़प्पा का अर्थ और जोदड़ो (मोहेंजोदड़ो) का अर्थ बतलाया गया है, बुरी तरह टूटा-फूटा ;ठंकसल कमवितउमक वत कमेींचमकद्ध।

हम पाते हैं कि खोरठा में हाड़पा (हड़प्पा) और जोदड़ो शब्द का प्रयोग वैसे ही अर्थों में होता है। जैसे- किसी नदी आदि में जब अकस्मात बाढ़ में उफान आ जाता है, तो खोरठा में कहते हैं-’ एखन नाउ-डोंगी कुछ नाँइ लागतउ, एखन हाड़पा नांभल हउ।’ वैसे ही जब कोई उपयोगि सुप, खाँची आदि बस्तु लम्बे समय तक उपयोग के बाद काफी टूट-फट जाय तो कहते हैं-’ इटा जोधड़ो भइ गेलो’ अथवा ’..धोधड़ो भइ गेलो।’

सिंधु सम्यता की खुदाई से बैलगाड़ी का आदि रूप ’सगर गाड़ी’ की प्राप्ति हुई है और झारखंड सहित पूरे खोरठा क्षेत्र में सगर-गाड़ी के अवशेष आज भी प्राप्य हैं। इतना ही नहीं यहाँ सड़क का नामकरण भी सगर गाड़ी के ही नाम से जुड़ा है। सड़क को यहाँ ’सगरठ’ कहा जाता है, यानी सगर गाड़ी चलने का रास्ता।

सिंधु सभ्यता की खुदाई से विश्व की संभवतः प्रथम लौह कारीगरी के प्रमाण मिले हैं। उनके वंशज बाद में भी लोहा को पर्याप्त महत्व देते रहे हैं। खोरठा क्षेत्र में आज भी लोहा को बहुत माना गया है। जब कि आर्य प्रथा में लोहा को निकृष्ट धातु माना गया है। जब कि खोरठा क्षेत्र में इसे पवित्र मानकर शिशु को ’मठिया’ नाम से लोहे का कड़ा पहनाया जाता है। साथ ही यदि द्विविवाह कहीं हो तो सौत का लोहा ’सइतिनेक लोहा’ पिंधेक रेवाज हे।

आर्य भिन्न मूल

कुछ भाषा कर्मी गलती से खोरठा सहित पूरे संपर्क भाषा परिवार को आर्य परिवारीय मानते रहे हैं। किंतु यह एक भ्रांति है। शब्द-प्रयोगान्वय से ज्ञात होता है कि खोरठा आर्य भिन्न मूल की भाषा है, तभी तो एक ही प्रकार के शब्द के अर्थ आर्य भाषाओं में जैसे पाए जाते हैं, खोरठा में उससे भिन्न अर्थ प्रयोग में आते हैं।

जैसे- ’कर’ शब्द का संस्कृतादि आर्य भाषाओं में चार अर्थो में प्रयोग हैं, कर- हाथ, कर-टेक्स, कर-सूर्य/चन्द्र किरण, कर हाथी की सूँड़- करिकर। परंतु झारखंडी भाषाओं सहित खोरठा में कर शब्द निपट भिन्न पाँच अर्थों में प्रयुक्त हैं। ’करे-करे’, कर काइट के, ई कर आव, करर्हिं आव आर करहिं बइस ’। यानी धीरे-धीरे बगल होकर इधर आवो, चुपके से आकर नजदीक बैठो। यहाँ खोरठा में कर शब्द पाँच अर्थों में आया है और पाँचो संस्कृत से भिन्न हैं। इसी प्रकार अनेकानेक अन्य दृश्टांत द्रष्टव्य हैं। उसी प्रकार कुछ और शब्द देखें- कटि- संस्कृत में ’कमर’, खोरठा में ’जरा सा’। मुनि-संस्कृत मे ऋषि, वहीं खोरठा में ’बहुत छोटा’ वइसे ही ’सूर, ताल, साधना, छंद आदि संस्कृत शब्दों का बिल्कुल ही आर्य भीन्न अर्थ हैं।

छंद शास्त्र में छंद, रस, अलंकार, सुर, ताल आदि-आदि को जहाँ संस्कृतादि आर्य भाषाओं में बहुत समादृत अथों में लिया गया है, वहीं खोरठा में बिल्कुल ही विपरीत अर्थों में लिया गया है। जैसे- ’ऊ बड़ी छंदाहा...।’, ’ ऊ छंदरनी जनी लागउ, बात नाँइ सुनतउ।’, छंदाही गाय दूधे नाँइ देतउ’, ’ कि छंद करे हें, बेस से काम कर’। यहाँ ’छंद’ का प्रयोग बदमासी, धोखेबाज, बहानेबाज जैसे अर्थ में किया गया है। वैसे ही ताल जहाँ निश्चित लय बद्धता के लिये प्रयोग किया जाता है। खोरठा में देखें- ’ओकर ताल उठल हइ..’, ऊ बड़ी तालाहा लोक’, ’ ओकर ताल सम्हार..’। यहाँ ’ताल’ शब्द का प्रयोग मूढ़ता और सनकी भाव को प्रदर्षित करने के लिए हुआ है। इसी प्रकार सुर, रस आदि शब्दों का आर्येत्त्तर अर्थ का प्रयोग खोरठा में होता है। ’ऊ बड़ी सुरियाहा लोक, ओकर सुर चाँपल हइ, ओकर रस खेपालि धरल हइ।’

आर्य भाषाओं की तरह अतिरंजित प्रयोग न होकर खोरठा में यथार्थवादी प्रयोग पाया जाता है, जैसे किसी के मरने पर कहा जाता है,’ ऊ सिराइ गेलइ.।’ ’स्वर्गवासी’ जैसे शब्द नहीं। उसी प्रकार आर्य परंपरा के विरूद्ध खोरठा में दैहिक श्रृंगार से संबद्ध शब्द प्रयोगों का नितांत अभाव है। क्यों कि दैहिक श्रृंगार से मानसिक विलासिता की भावना पैदा होती है।

खोरठा भाषा का शब्द भंडार

खोरठ का अति समृद्ध, व्यापक शब्द भंडार है। इसकी समृद्धि एवं व्यापकता का यह हाल है कि किसी एक ही शब्द के दो सौ से भी अधिक पर्यायवाची शब्द प्रयोग प्राप्य हैं। उदाहरणतः क्षुद्राकार दर्षक प्रयोग के दृश्टांत लें- कटि गो, खाँट, खुदु, गाड़ाक-गुड़ुक, गाड़ार-गुड़ुर, गिधी-गिधी, गिधु-गिधु, गुड़कु, गुड़ना, गुड़रा, गुड़ु, गुड़रू, गुड़ा, गुधुपुटु, गुजनु, गुड़रा, गुड़ी, गेंड़रा, गेड़ा, गेड़मेठा, गेड़े, धुजु, धुटु, चुटी, चुटू, चुटकी, चुकरी, चुटरी, चुटिया, छुटु मुटु, छुटका, छुटन, छुटना, छुटु, छूटकु, टेप, ठेपना, छेपका, छोटका,छोटकु,छोटन, छोटका, जुमना, टिकला, टिका, टिपरा, टिरका, टिरकु, टिरा, टिरू, टुना, टुनु, टुनकू, टूरा, टेपरा, टेपु, ठुठकु, ठुठनु, ठुपना, ठुपनु, ठुपका, ठुरका, ठुरकुु, ठेपना, ठेपा, ठेपो, ठेपु, ठेपुवा, डेढ़बितना, डेढ़ बिताक, डिमा,डिमु, डीबु, डुटू, डुभू, ढुबा, ढुमका, ढुमन, ढुमना, ढुमकु, ढुमा , ढुलकु, ढेबा, ढेमना, ढेलकी, ढुलु, रिगड़िया, रेंगटा, रेंगना, रेघना, रेंघु, रूटा, रूठना, रूठनाहा, रूठनु, रूनु, लुढ़का, लुढ़कु, लुढ़कुन, लुघा, लुघु, लेदना, लेदा, लेदू......।

इस प्रकार मात्र पुल्लिंग शब्द रूप प्रय पोने दो सौ हैं। अब चूकि अनेक स्त्रीलिंग रूप भी व्यवहार्य हैं अतः कुल पर्याय दो सौ से अधिक हैं। इस दृश्टि कोण से यह अद्वितीय प्रतीत होता है।

व्याकरण
खोरठा व्याकरण में व्याकरण के पाँचो भागों पर विचार किया जाता है। वर्ण विचार, शब्द विचार, वाक्य विचार, विराम विचार, एवं छंद विचार।

इनमें से खोरठा की अपनी कुछ अद्वितीय बिशेषताएँ हैं। अधिकरण कारक का सर्वाधिक कारकों में प्रयोग, चार कारकों में। जैसे- बापें कहल (पिताजी ने कहा), एतने में हतउ (इतने में से होगा), घरें हतउ (घर में ही होगा), ओकरर्हीं देहिं (उसके ही लिए दो)।

खोरठा भाषा में तीनों कालों के सभी भेदों में किसी एक ही क्रिया प्रायः आठ सौ रूप होते हैं। जो प्रायः अद्वितिय है।

खोरठा भाषा कर्मि डॉ0 ए0 के0 झा ने सर्वप्रथम झारखंडी भाषाओं की आंतरिक एकता की खोज की ओर ’खोरठा सहित सदानी बेयाकरण’ लिखा।

Current Cover

अंकः 1, वर्षः 2, सितम्बर 2010

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Issue: 1, Volume: 2, September 2010

 

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खोरठा झारखंडेक गोटे उत्तरी छोटा नागपूर, संथाल परगना छाड़ा राँची, पलामुक हिस्सा में पसरल हे आर ई हिंयाक मूलवासी-आदीवासीक संपर्क भासा हे। एकर पढ़ाई एखन नवम कलास सें एम0 ए0 तक भइ रहल हे। एकर सें पी0 एच-डी0 डी0लीट्0 भइ रहल हे। एकर लइ जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।

 

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है।

 

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